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नए भारत का नया कानून: भारतीय न्याय संहिता बिल 2023

कानून का निर्माण समय एवं परिस्थिति के अनुसार होता है।  भारत में ब्रितानी सरकार ने अपनी सुविधा के अनुरूप कई नियम कानून बनाये। आजादी के बाद भी  इनमें कई क़ानून बिना परिवर्तन के ठीक वैसे ही चले आ रहे हैं जबकि वर्तमान समय में देश की परिस्थितियों में  परिवर्तन हो चुका है। परिस्थितियों की ये मांग थी की  गैरजरूरी धाराओं को समाप्त करके वर्तमान समय के अनुकूल कानून बनाया जाए। इसी के सन्दर्भ में शुक्रवार को गृह मंत्री अमित शाह ने भारतीय न्याय संहिता बिल 2023 , भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता बिल 2023 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम बिल 2023  संसद में  पेश किया । इसमें IPC और CrPC की कई धाराओं को बदलने का प्रस्ताव रखा गया है। इस बिल में आपराधिक दंड संहिता में महत्वपूर्ण परिवर्तन होगा। अब IPC को भारतीय न्याय संहिता कहा जाएगा।  इस बिल प्रावधानों से सबंधित सभी जानकारी इस ब्लॉग के माध्यम से दी जा रही है।  

 

नए भारत का नया कानून: भारतीय न्याय संहिता बिल 2023
नए भारत का नया कानून

 

पुराने नियम क़ानून में परिवर्तन की आवश्यकता क्यों : 

 

अब सवाल ये खड़ा होता की ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाये गए कानून जब भारत की आजादी के वर्षों बाद तक अस्तिव्त्व में रहे तो इनमे परिवर्तन की आवश्यकता क्यों पड़  गयी है।  इसका जवाब यही है की ये क़ानून वर्तमान समय अपराध की कई श्रेणियों के लिए अपर्याप्त हो गए थे। इसके अलावा डिजिटल होती दुनिया में साक्ष्यों को भी डिजिटल प्रणाली के अंतर्गत लाना आवश्यक हो गया था।  

 

उदहारण के लिए 

 

  • वर्तमान कानून देश के भगोड़े और देश के विरुद्ध विदेशी भूमि से साजिश करने वालों के लिए कोई विशेष कानूनी प्रावधान नहीं थे।  
  • कानूनों में मानव हत्या या स्त्री के साथ दुराचार जैसे जघन्य अपराधों को बहुत नीचे रखा गया और राजद्रोह, खजाने की लूट शासन के अधिकारी पर हमले जैसे अपराधों को इनसे ऊपर रखा गया।
  • क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम में बहुत समय लगता है, न्याय इतनी देर से मिलता है कि न्याय का कोई मतलब ही नहीं रह जाता है, लोगों की श्रद्धा उठ गई है और अदालत में जाने से डरते हैं।
  •  तीनों पुराने कानून गुलामी की निशानियों से भरे हुए थे, इन्हें ब्रिटेन की संसद ने पारित किया था जिसे वर्तमान में भी धोया जा रहा था।  

 

अब नए भारतीय न्याय संहिता बिल 2023 में क्या होगा :

 

नए भारतीय न्याय संहिता बिल 2023 के अंतर्गत  कानून में 511 धाराओं की तुलना में 356 धाराएं सम्मिलित की जाएंगी।  जैसे धारा  6 से लेकर 52 तक उल्लेखित कानूनों में अस्पष्टता जिनमें  एक प्रकार का बिखराव था।  अब इन कानूनों को समेकित करके एक ही धरा के अंतर्गत लाया जाएगा।  अत्याधुनिक तकनीकों को समाहित किया गया है। दस्तावेज़ों की परिभाषा का विस्तार कर इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल रिकॉर्ड्स, ई-मेल, सर्वर लॉग्स, कम्प्यूटर, स्मार्ट फोन, लैपटॉप्स, एसएमएस, वेबसाइट, लोकेशनल साक्ष्य, डिवाइस पर उपलब्ध मेल और मैसेजेस को कानूनी वैधता दी गई है, जिनसे अदालतों में लगने वाले कागज़ों के अंबार से मुक्ति मिलेगी।  अब  एफआईआर से केस डायरी, केस डायरी से चार्जशीट और चार्जशीट से जजमेंट तक की सारी प्रक्रिया को डिजिटलाइज़ करने का प्रावधान इस कानून में किया गया है

 

पुलिस कार्यवाई के दौरान- 

 

  • कानून में दस्तावेज़ों की परिभाषा का विस्तार कर इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल रिकॉर्ड्स, ई-मेल, सर्वर लॉग्स, कम्प्यूटर, स्मार्ट फोन, लैपटॉप्स, एसएमएस, वेबसाइट, लोकेशनल साक्ष्य, डिवाइस पर उपलब्ध मेल, मैसेजेस को कानूनी वैधता दी गई है
  • सर्च और ज़ब्ती के वक़्त वीडियोग्राफी को कंपल्सरी कर दिया गया है जो केस का हिस्सा होगी और इससे निर्दोष नागरिकों को फंसाया नहीं जा सकेगा, पुलिस द्वारा ऐसी रिकॉर्डिंग के बिना कोई भी चार्जशीट वैध नहीं होगी
  • 7 वर्ष या इससे अधिक सज़ा वाले अपराधों के क्राइम सीन पर फॉरेंसिक टीम की विज़िट को कंपल्सरी किया जा रहा है, इसके माध्यम से पुलिस के पास एक वैज्ञानिक साक्ष्य होगा जिसके बाद कोर्ट में दोषियों के बरी होने की संभावना बहुत कम हो जाएगी
  • सरकार आज़ादी के 75 सालों के बाद पहली बार ज़ीरो एफआईआर को शुरू करने जा रही है, अपराध कहीं भी हुआ हो उसे अपने थाना क्षेत्र के बाहर भी रजिस्टर किया जा सकेगा
  • पहली बार ई-FIR का प्रावधान जोड़ा जा रहा है, हर ज़िले और पुलिस थाने में एक ऐसा पुलिस अधिकारी नामित किया जाएगा जो गिरफ्तार किए गए व्यक्ति के परिवार को उसकी गिरफ्तारी के बारे में ऑनलाइन और व्यक्तिगत रूप से सूचना करेगा
  • यौन हिंसा के मामले में पीड़ित का बयान कंपल्सरी कर दिया गया है और यौन उत्पीड़न के मामले में बयान की वीडियो रिकॉर्डिंग भी अब कंपल्सरी कर दी गई है
  • पुलिस को 90 दिनों में शिकायत का स्टेटस और उसके बाद हर 15 दिनों में फरियादी को स्टेटस देना कंपल्सरी होगा

 

न्यायिक प्रक्रिया के दौरान –

 

  • छोटे मामलों में समरी ट्रायल का दायरा भी बढ़ा दिया गया है, अब 3 साल तक की सज़ा वाले अपराध समरी ट्रायल में शामिल हो जाएंगे, इस अकेले प्रावधान से ही सेशन्स कोर्ट्स में 40 प्रतिशत से अधिक केस समाप्त हो जाएंगे
  • आरोप पत्र दाखिल करने के लिए 90 दिनों की समयसीमा तय कर दी गई है और परिस्थिति देखकर अदालत आगे 90 दिनों की परमीशन और दे सकेंगी, इस प्रकार 180 दिनों के अंदर जांच समाप्त कर ट्रायल के लिए भेज देना होगा
  • कोर्ट अब आरोपित व्यक्ति को आरोप तय करने का नोटिस 60 दिनों में देने के लिए बाध्य होंगे, बहस पूरी होने के 30 दिनों के अंदर माननीय न्यायाधीश को फैसला देना होगा, इससे सालों तक निर्णय पेंडिंग नहीं रहेगा और फैसला 7 दिनों के अंदर ऑनलाइन उपलब्ध कराना होगा
  • सिविल सर्वेंट या पुलिस अधिकारी के विरूद्ध ट्रायल के लिए सरकार को 120 दिनों के अंदर अनुमति पर फैसला करना होगा वरना इसे डीम्ड परमीशन माना जाएगा और ट्रायल शुरू कर दिया जाएगा
  • घोषित अपराधियों की संपत्ति की कुर्की का भी प्रावधान लेकर आए हैं, अंतरराज्यीय गिरोह और संगठित अपराधो के विरूद्ध अलग प्रकार की कठोर सज़ा का नया प्रावधान भी इस कानून में जोड़ा जा रहा है

 

आरोपी एवं पीड़ित पक्ष से सम्बंधित –

 

  • शादी, रोज़ग़ार और पदोन्नति के झूठे वादे और गलत पहचान के आधार पर यौन संबंध बनाने को पहली बार अपराध की श्रेणी में लाया गया है
  • गैंग रेप के सभी मामलों में 20 साल की सज़ा या आजीवन कारावास का प्रावधान किया गया है
  • 18 वर्ष से कम आयु की बच्चियों के साथ अपराध के मामले में मृत्यु दंड का भी प्रावधान रखा गया है,
  • हमेशा के लिए अपंगता आने या ब्रेन डेड होने की स्थिति में 10 साल या आजीवन कारावास की सज़ा का प्रावधान किया गया है
  • बच्चों के साथ अपराध करने वाले व्यक्ति के लिए सज़ा को 7 साल से बढ़ाकर 10 वर्ष कर दिया गया है, अनेक अपराधों में जुर्माने की राशि को भी बढ़ाने का प्रावधान किया गया है
  • अनुपस्थिति में ट्रायल के बारे में एक ऐतिहासिक फैसला किया है, सेशन्स कोर्ट के जज द्वारा 
  • मॉब लिंचिग के लिए 7 साल, आजीवन कारावास और मृत्यु दंड के तीनों प्रावधान रखे गए हैं
  • सज़ा माफी को राजनीतिक फायदे के लिए उपयोग करने  वाले अब मृत्यु दंड को आजीवन कारावास, आजीवन कारावास को कम से कम 7 साल की सज़ा और 7 साल के कारावास को कम से कम 3 साल तक की सज़ा में ही बदला जा सकेगा और किसी भी गुनहगार को छोड़ा नहीं जाएगा

 

निष्कर्ष :

 

कानून पीड़ित व्यक्ति को नये दिलाने के लिए होता है। लेकिन कानून अगर स्वयं व्यक्ति को पीड़ित करे तो ऐसे कानून को समाप्त हो जाना चाहिए या फिर उसमें आमूल चूल सुधार होना चाहिए। भारत कई वर्षों से ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाए ऐसे कानून को ढो रहा था जो वर्तमान समय में प्रासंगिक नहीं रह गए थे। अब जबकि ये बिल संसद में पेश हो गया है तो उमीद  यही है की  भारतीय न्याय संहिता बिल 2023 कानून की गैर प्रासंगिक भागों में सुधार होगा । 

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