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आखिर क्या खेल है समान नागरिक संहिता का/ Uniform Civil Code In Hindi

भारत एक ऐसा राष्ट्र है जो अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विविधता के लिए जाना जाता है। यहाँ धर्म, क्षेत्र, जाति इत्यादि के आधार पर अपनी अलग अलग मान्यता एवं परंपरा है। इन सबके मध्य देश लंबे समय से समान नागरिक संहिता के सवाल से जूझ रहा है । समान नागरिक संहिता का लक्ष्य धार्मिक एवं सामाजिक पृष्ठभूमि को अलग रखते हुए सभी नागरिकों के लिए व्यक्तिगत कानून की एकसमान संहिता तैयार करना है । समय समय पर सर्वोच्च न्यायालय भारत सरकार को समान नागरिक संहिता लागू करने के निर्देश देता रहा है । वर्तमान सरकार संसद में समान आचार संहिता को लेकर बिल लाने की तैयारी में है ।

22 वें विधि आयोग ने समान नागरिक संहिता को लेकर आम नागरिकों एवं धार्मिक संगठनों से जुड़े लोगों से राय मांगी है जिसके लिए एक माह का समय दिया गया है । समान नागरिक संहिता को लेकर पूरे देश में हलचल मची हुई है, इसके पक्ष और विपक्ष को लेकर लोगों के अपने अलग अलग विचार हैं । इस ब्लॉग में, हम सामान्य नागरिक संहिता की अवधारणा पर चर्चा करते हुए  ‘ uniform civil code in hindi’ विषय आधारित ब्लॉग में  विषय से संबंधित सभी पक्षों की रूपरेखा प्रस्तुत कर रहे हैं। उम्मीद है की ब्लॉग को पढ़ने के पश्चात समान नागरिक संहिता को लेकर आपकी जिज्ञासा का समाधान संभव हो सकेगा।

 

uniform civil code in hindi
समान नागरिक संहिता

 

सामान्य नागरिक संहिता क्या है/ What Is Uniform Civil Code In Hindi

 

सामान्य नागरिक संहिता का तात्पर्य है भारत के प्रत्येक नागरिक को उनकी धार्मिक मान्यताओं से अलग कुछ व्यक्तिगत मामलों में जैसे विवाह, तलाक, विरासत, गोद लेने और संपत्ति के अधिकार में एक समान कानून का निर्माण करना है । भारत में धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता पायी जाती है । यहाँ हिंदू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई और अन्य धार्मिक समुदायों के लिए व्यक्तिगत कानून (Personal Law) सदियों से मौजूद हैं। समान नागरिक संहिता का विचार इन सभी कानूनों के स्थान पर एक समान कानून लाना है। भारत के संविधान के निर्माण के समय समान नागरिक संहिता पर व्यापक चर्चा की गयी थी। अंबेडकर ने संविधान का मसौदा तैयार करते समय कहा था कि समान नागरिक संहिता राष्ट्र के लिए आवश्यक है लेकिन इसे तब तक स्वैच्छिक रहना चाहिये जब तक कि राष्ट्र इसे स्वीकार करने के लिये सामाजिक रूप से तैयार न हो जाए। समान नागरिक संहिता को संविधान में स्थान देते हुए अनुच्छेद 44 में कहा गया है कि राज्य, भारत के समस्त राज्य क्षेत्र में नागरिकों के लिये एक समान सिविल संहिता प्राप्त कराने का प्रयास करेगा।।

 

 

सामान नागरिक संहिता का उद्देश्य क्या है

 

समान नागरिक संहिता का उद्देश्य देश के सभी नागरिकों को व्यक्तिगत मामले में एक समान कानूनों की रूपरेखा तैयार करना है। जिसके आधार पर निम्नलिखित उद्देश्यों की प्राप्ति की जा सकती है।

 

 

राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देना:

 

समान नागरिक संहिता लागू करने का एक प्रमुख लक्ष्य राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देना है। भारत संविधान द्वारा संचालित एक लोकतान्त्रिक देश है। भारत सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून से विविध धर्म और संस्कृतियों के मध्य एकता का संवर्धित कर सकता है। ऐसा कानून जो धार्मिक पूर्वाग्रहों से अलग प्रत्येक नागरिक के साथ एक सामान व्यवहार करता हो तथा विभिन्न पृष्ठभूमि के व्यक्तियों के बीच अपनेपन और एकता की भावना को बढ़ावा देता हो। यह “एक राष्ट्र, एक कानून” के विचार को प्रोत्साहित करता है और इस धारणा को पुष्ट करता है कि कानून के समक्ष प्रत्येक नागरिक समान है।

 

लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण :

 

भारत में महिलायें किसी भी जाती या धर्म की हों सदियों से उपेक्षा का शिकार रही हैं। महिलाओं को उनके मूलभूत अधिकारों से वंचित रखा गया है। सामान नागरिक संहिता लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। भारत में व्यक्तिगत कानून, विशेष रूप से विवाह, तलाक और विरासत से संबंधित कानून महिलाओं के हितों के विपरीत रहे हैं। इसके कारण लैंगिक भेदभाव को समाप्त नहीं किया जा सका है। एक सामान नागरिक संहिता द्वारा पारंपरिक कानूनों में लैंगिक भेदभाव के प्रति अंतर्निहित असमानताओं और पूर्वाग्रहों को दूर किया जा सकता है । इससे महिलाओं के लिए समान अधिकार और अवसर सुनिश्चित होंगे, जिससे वे सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में पूरी तरह से भाग लेने में सक्षम होंगी।

 

 

सामाजिक समरसता एवं धर्मनिरपेक्षता:

 

धर्मनिरपेक्षता के प्रति भारत की प्रतिबद्धता उसके संविधान में निहित है, जो धर्म की स्वतंत्रता और किसी भी धर्म का पालन करने और प्रचार करने के अधिकार की गारंटी देता है। हालाँकि, विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों का अस्तित्व कभी-कभी सामाजिक विभाजन और संघर्ष पैदा कर सकता है। न्याय, समानता और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों पर आधारित एक सामान्य नागरिक संहिता विभाजन से सम्बंधित मुददों का समाधान कर सामाजिक सदभाव को बढ़ावा दे सकती है। समान नागरिक संहिता अंतरधार्मिक संवाद, विविधता के प्रति सम्मान और कानूनी अधिकारों और दायित्वों की साझा समझ को प्रोत्साहित करता है।

 

 

भारत में व्यक्तिगत कानून की स्थिति :

 

भारत में कानून की स्थिति की बात करें तो आपराधिक मामलों से संबंधित कानून सभी धर्मों के नागरिकों पर एक समान रूप में लागू होते हैं। यानी साधारण चोरी से लेकर किसी व्यक्ति की हत्या से संबंधित मामलों में सभी धर्म के व्यक्तियों को कानून के आधार पर एक समान सजा का प्रावधान है। नागरिक क़ानून धार्मिक मान्यताओं के अनुसार लागू होते हैं। ये कानून धर्मग्रंथों पर आधारित मूल्यों से प्रभावित होते हैं।

 

  • वर्तमान समय में व्यक्तिगत कानूनों की स्थिति अलग अलग धर्मों के लिए अलग अलग हैं। हिन्दुओं के व्यक्तिगत क़ानून (सिक्ख, बौद्ध और जैन धर्मावलंबी सम्मिलित) भारतीय संसद द्वारा 1956 में संहिताबद्ध किये गए कानूनों द्वारा संचालित होते हैं। इन कानूनों को चार भागों में विभाजित किया गया है/ हिन्दू विवाह अधनियम (1955)  /हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम (1956) / हिंदू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम (1956) / हिंदू दत्तक तथा भरण-पोषण अधिनियम (1956)

 

  • मुस्लिमों को व्यक्तिगत कानून 1937 के शरीयत कानून के अनुसार संचालित होते हैं। क़ुरआन और हदीस की अपनी व्याख्या के आधार पर एक घोषणा की गई है, इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि राज्य व्यक्तिगत विवादों के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा बल्कि एक धार्मिक प्राधिकरण करेगा। इसके अलावा काजी अधिनियम (1880) / मुस्लिम विवाह अधिनियम (1939)  /  मुस्लिम महिला अधिनियम (1986) अन्य मुस्लिम व्यक्तिगत कानून हैं।  

 

  • अन्य धर्मों में भारतीय ईसाई विवाह अधिनियम (1872) / पारसी विवाह और तलाक अधिनियम (1936) सम्मिलित हैं।  

 

चुनौतियाँ और आगे का रास्ता:

 

भारत में समान नागरिक संहिता लागू करने में चुनौतियां कम नहीं है। भारत का संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकार धार्मिक स्वतंत्रता को सुरक्षा प्रदान करता है। सदियों से चले आ रहे धार्मिक कानून के उल्लंघन से विभिन्न धार्मिक समुदायों की चिंता और प्रतिक्रिया की संभावना हैं । हिन्दू भले ही व्यक्तिगत कानून का पालन करते हैं परंतु देश के अलग अलग भाग में अपने रीति रिवाजों के अनुसार भी प्रथाएं प्रचलित हैं।

आदिवासी समुदाय की अपनी अलग अलग मान्यताएं हैं। मुस्लिमों में बोहरा मुस्लिम समुदाय के रीत रिवाज अन्य मुस्लिम समुदायों की तुलना में भिन्न है। पूर्वोत्तर भारत के जनजातीय समुदाय जो ईसाई धर्म को मानते हैं, वे इस धर्म की प्रथाओं के स्थान पर अपनी स्थानीय प्रथाओं का पालन करते हैं।

इसीलिए सामान अचार संहिता के लिए लाये जाने वाले बिल में इस बात को सुनिश्चित करना पड़ेगा की एक ऐसे बिल का निर्माण किया जाए जो धार्मिक प्रथाओं का सम्मान करते हुए सभी धर्मों और जहां तक संभव हो विविध सांस्कृतिक प्रथाओं को एक सामान क़ानून में समायोजित करता हो। इसके अलावा इस कानून के सफल कार्यान्वयन के लिए विभिन्न राजनीतिक दलों और हितधारकों के बीच आम सहमति बनाना आवश्यक है।

खुला संवाद, शिक्षा और जागरूकता अभियान गलतफहमियों को दूर करने और सामान्य नागरिक संहिता को अपनाने के लिए अनुकूल माहौल बनाने में मदद कर सकते हैं। हालांकि भारत में सामान अचार संहिता जैसे कुछ प्रयास पूर्व में किये गए हैं जैसे हिन्दू कोड बिल और तीन तलाक जैसे मुद्दों पर निर्मित क़ानून।

आपराधिक मामलों में एक सामान कानून का पालन किया जाता है। चोरी करने और हत्या करने के विरुद्ध सजा देने के लिए सभी धर्मों एवं संस्कृति के लिए एक सी कानून व्यवस्था है। अपराध करने वालों के धार्मिक मान्यताओं के आधार पर सजा नहीं दी जाती है। कुछ इसी प्रकार के कानून सामान अचार संहिता द्वारा व्यक्तिगत मामले में किया जा सकता है।

 

निष्कर्ष

एक समान नागरिक संहिता में राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने, लैंगिक समानता को बढ़ावा देने और सामाजिक सद्भाव को मजबूत करके भारत के कानूनी परिदृश्य को बदलने की क्षमता है। यह न्याय, समानता और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों का प्रतीक है, जो एक प्रगतिशील और समावेशी समाज के स्तंभ हैं।

जैसे-जैसे भारत भविष्य की ओर आगे बढ़ रहा है, समान नागरिक संहिता के आसपास की बहस को खुले दिमाग और अपने सभी नागरिकों के लिए एक न्यायसंगत और न्यायसंगत समाज बनाने की प्रतिबद्धता के साथ किया जाना चाहिए। सामान नागरिक संहिता को लेकर एक राय बनाने के लिए विधि आयोग ने देश के सभी नागरिकों से उनकी राय के लिए एक महीने का समय दिया है। सामान नागरिक संहिता में किन किन कानूनों को शामिल किया जाएगा ये भविष्य में विधि आयोग के सलाह और संसद में पेश किये जाने वाले बिल के आधार पर स्पष्ट होगा।  

 

(नोट:   uniform civil code in hindi   ब्लॉग का उद्देश्य सामान आचार संहिता के प्रति एक नजरिया प्रस्तुत करना है। यह भारत में सामान्य नागरिक संहिता के कार्यान्वयन से जुड़ी जटिलताओं और बारीकियों पर चर्चा नहीं करता है। इसकी व्यापक समझ के लिए कानूनी विशेषज्ञों के साथ आगे के शोध और परामर्श की सिफारिश की जाती है।)

 

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